Thursday, April 01, 2010

पड़ो अपावन ठौर पै, कंचन तजत ना कोई.

हमारे एक टीचरजी थे, जो दो-बीड़ा पान खा के पढ़ाने आते थे. वह ज्यादतर बात नीचे का होठ गोल करके उसे ऊपर के होठ पर फिट बिठा के, ठोड़ी ऊँची कर के, अपनी तर्जनी से चश्मा ऊपर करके "हूँ-हूँ" की ध्वनि और अपने हाथ के इशारे से कर लेते थे. पर कभी-कभी जब स्थिति असामान्य हो जाती तो उन्हें मजबूरन खिड़की से बाहर पीक थूक के, पूरा मुंह खोल कर गालियां देनी पड़ती थीं, "अरे मूर्खों, भूतों, शिव जी के गणों! शांत हो जाओ, शांत हो जाओ. एक-एक कर के बको. ऐसे तो सारे जीवन बारहखड़ी भी नहीं सीख पाओगे."

टीचरजी बेचारे हिंदी पढ़ाते थे, और क्लास के बच्चे हिंदी पढने को तैयार ही नहीं था. उसके कई कारण थे, एक तो यह सबकी धारणा थी कि हिंदी सीख कर होगा क्या? और दूसरा यह कि जो हिंदी हम घर में बोलते थे और जो टीचरजी पढ़ाना चाहते थे उसमे ज़मीन-असमान का फर्क था. हमको समझ ही में नहीं आता था कि पान की पीक के छींटे अपने कपड़ों पे छिड़कवा के इतनी कठिन जुबान सीखने का फायदा क्या है.

जिस गली में सब अंधे, वहाँ एक आँख वाला राजा. मुझे हिंदी अच्छी आती थी तो टीचर जी के प्रश्नों का उत्तर अक्सर मैं ही देता था और शाबाशी खाते-खाते बहुत से पीक के छींटे भी खा जाता था, हिंदी का घंटा ख़तम होते-होते मेरी सफ़ेद कमीज़ और भूरी हाफ-पैंट पर पीक का भूगोल बन जाता था. फिर सब लड़के मेरा मज़ाक उड़ाते थे, यह देखो "हिंदी का पीकदान आया. आइये महाराज. हम मूर्खों, भूतों, शिव जी के गणों को आशीर्वाद दीजिये... आप तो स्वं ही शिवजी हैं. राख ना सही पीक ही सही, पीक पोते शिव जी, पीक पोते शिव जी..."

उस दिन मुझे लड़कों ने बहुत तंग किया. मैं बहुत भरा हुआ घर लौटा. घर में ही घुसते ही आपने कमरे में जा के लेट गया. मेरे छोटे से मन ने यह सोचा कि मुझे ही पीक क्यों खानी पड़ती है, क्योंकि मुझे बय चांस हिंदी अच्छी आती है. बय चांस नहीं, इसलिए कि मम्मी मुझसे इतनी अच्छी हिंदी में बात करती हैं. क्या ज़रुरत है उन्हें अच्छी हिंदी बोलने की, मुझे बराबर सिखाने की? 'आज क्या पढ़ाया हिंदी में तुम्हें?' हुं? फिर मुझे इतनी सारी चीज़ें सिखा देंगी कि टीचरजी के पूछने पर मेरा हाथ अपने आप उपर उठ जाता है. और टीचरजी भी इतने गंदे कि शाबाशी देते-देते मुझ पर पीक करते जाते हैं. फिर सारे लड़के मुझे परेशान करते हैं.

यानि कि सारी दुनिया गन्दी और इसमें मेरा कोई दोष नहीं. पर मम्मी ने तो चार-चार और बच्चे पाले थे, देखते ही समझ गयीं कि कुछ बात है आज जो मैं छिपा रहा हूँ. धीरे-धीरे सारी बात पता कर ली. मैंने भी ठान रखी थी, "अब मैं कब्भी भी किस्सी सवाल का जवाब नहीं दूंगा क्लास में, गंदे टीचरजी, गंदे बच्चे, गन्दी हिंदी , सब गंदे! और तुम भी मुझसे ऐसे अच्छी-अच्छी हिंदी में बात मत किया करो, मुझे नहीं सीखनी हिंदी-विंदी."

"अच्छा-अच्छा, मत सीखना हिंदी."

माँ धीरे-धीरे अपना काम निबटाती रही और गुनगुनाती रही. माँ लड्डू बना रही थी जो मुझे बहुत पसंद थे और फिर जब आटा, चीनी और दूध भूनते थे तो उसकी खुशबू मेरे सारे दुःख दूर कर देती थी. मैं भी उस खुशबू के चक्कर में वहीँ चौके में ही चक्कर काटता रहा. मैंने देखा माँ की रूचि मेरी स्थिति से हट कट लड्डू का आटा भूनने में चली गई है और सारा ध्यान ही उधर है, तो बुरा लगा. यहाँ मैं इतनी मुश्किलों में हूँ, और वहाँ माँ को कोई फिकर ही नहीं है. माँ का ध्यान पाने के लिए उससे पूछा, "माँ क्या गुनगुना रही हो?" माँ ने थोडा जोर से गाया, "पड़ो अपावन ठौर पै, कंचन तजत ना कोई" फिर पूछा, "समझ में आया?"
मैंने कहा, "नहीं."
कहने लगी, "अपावन माने पता है?"
मैंने दिमाख पर जोर दे कर कहा, "हाँ, जो पावन ना हो."
"तो क्या है वह?"
मैंने अपना छोटा सा दिमाख लगाया, "जो पावन नहीं है, मतलब गन्दा-शंदा"
"हाँ! ठीक. और वहाँ अगर कंचन यानि सोना पड़ा हो तो?"
"तो क्या?"
"तो कोई उसे इसलिए छोड़ देगा की वह गन्दी-शंदी जगह पड़ा हुआ है?"
मैंने सोचा की क्योंकि मम्मी पूछ रहीं है, तो इसमें कोई बात तो होगी. इसलिए जवाब होना चाहिए, "नहीं." तो मैंने कहा, "नहीं"
पर मम्मी ने तो चार-चार और बच्चे पाले थे ना, इसलिए उसे तो पता चल ही गया ना की मैं बिना सोचे हुए कह रहा हूँ.
"हाँ. पर क्यों, पता है?"
"नहीं?"
"क्योकि अगर सोना अपावन ठौर पर है भी तो इसमें उसका कोई दोष नहीं. और फिर उसे उठा के साफ कर लो तो उसकी कीमत उतनी की उतनी. सिर्फ इस लिए तो सोना नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि वह गन्दी-शंदी जगह पड़ा हुआ है. अब देखो तुम्हारे टीचर जी, वह हिंदी पढ़ाते हैं तो कैसा लगता है?"
"पर माँ वह पान खा कर पीक छिड़कते रहते हैं, बहुत गंदे हैं."
"हाँ, पर हिंदी कैसी पढ़ाते हैं."
"हिंदी तो अच्छी पढ़ाते हैं, पर वह बात नहीं है."
"तो क्या बात है...कपडे गंदे हो जाते है? वह तो मैं धो देती हूँ."
"वह बात नहीं है माँ, बाकी बच्चे मुझे छेड़ते हैं...."
"और क्या कहते हैं की तुम शिव जी के गण हो? कल जब वह यह कहें तो कहना धन्यवाद, मैं तो हमेशा से शिव जी का गण बनना चाहता था, क्योंकि शिव जी मेरे आराध्य देव हैं.."
मेरी आँख में आंसू आ गए, "तुम भी बहुत बुरी हो माँ, क्यों सिखाती हो यह सब मुझे. मत बात किया करो न इतनी अच्छी हिंदी में मुझसे.."

पर वह माँ के गुनगाने की धुन, वह तो मन में बस गई. "पड़ो अपावन ठौर पै, कंचन तजत ना कोई." समझने के बाद कि गन्दी जगह पर पड़े होने के बावजूद, सोना सोना रहता है, मेरे मन के सारे डर धीरे-धीरे दूर हो गए. हिंदी की क्लास में मेरा हाथ सबसे ज्यादा उठता रहा और नंबर, नंबर का क्या है वह तो अच्छे आये ही, पर इससे ज्यादा ख़ुशी इस बात की है, मुझे सोने और गंदगी में फर्क करना आ गया.

4 comments:

Kamaksha Mathur said...

नि:संदेह बहुत ही अच्छी सीख है और बहुत अच्छा लिखा है आपने! काश आज के बच्चे भी हिंदी पढ़ कर ऐसी कहानियों से प्रेरित होयें! बहुत बढ़िया!! मज़ा आया !

Anjini said...

आपकी यह रचना पढ़ कर कबीरदास जी का दोहा याद आ गया:
गुर धोबी सिख कपड़ा साबुन सिरजन हार,
सुरति सिला पर धोइये निकसे ज्योति अपार .

Anupama Krishnamurthy said...

Dear Sanjay Bhai,
This story is very heartwarming. I relate to it not just because of my love and respect for Hindi but also because your stories take me back to my childhood and schooling days in villages and small towns of India.

Anupama
Http://mitholimdo.wordpress.com

SUMAN said...

Here is a abig 'shabas'to you Sanjay for keeping hindi alive and kicking.Since i teach hindi to expatriates in mumbai --i am trying to do the same too. !! good luck and 'all the best'
suman from Mumbai'