Friday, April 09, 2010

"जग दर्शन का मेला"

जब मैं बहुत पीछे पड़ता कि माँ बताओ तुम किस कोलेज में पढ़ी हो? पप्पू की माँ ने एम् ऐ किया है संस्कृत में, तुमने किसमे किया है? तो माँ पता है क्या कहती? वह कहती कि मैं तो गृहस्ती की क्लास में पढ़ी हूँ, जोइंट फॅमिली मेरा कोलेज था और तुम्हारे पापा उसके प्रिंसिपल.

"और तुम्हारे सब्जेक्ट्स क्या थे?"

"जुगत, दर्शन, होम साइंस और धरम-करम, बस यही सब.."

"ये सब पापा ने पढाये तुम्हें?"

"नहीं! मैंने खुद पढ़े, पापा तो प्रिंसिपल थे ना."

"खुद कैसे पढ़े?"

"वैसे ही, जैसे तुम पराग, नंदन, चंदा मामा, बेताल वगेरह पढ़ते हो."

"तुम क्या पढ़ती थीं?"

"वो सारी किताबें जो अलमारी हैं."

जी हाँ! हमारे यहाँ एक लकड़ी की बड़ी अलमारी थी. उसमे पता नहीं क्या-क्या अंगड़-खंगड़ भरा रहता था. वह मम्मी की अलमारी कहलाती थी, और उसे खोलने से पहले हमें माँ से इजाज़त लेनी पड़ती थी. पता नहीं क्यों? उसमे ना तो कोई मंहगी चीज़ थे, ना कोई नायब हीरा. कम से कम मुझे तो यही लगता था. था क्या? पुराने वीमेन एंड होम, कल्याण के रिसाले, सूर, कबीर, मीरा की पोथियाँ, घर का जिल्द किया हुआ शिव पुराण, उर्दू के अफ़साने, प्रेमचंद की रोवनटी कहानियां, शिवानी और गुलशन नंदा के नोवल्स, वृन्दावन लाल वर्मा, महादेवी वर्मा, नेहरु, विवेकानंद, स्वामी रामकृष्ण के उपदेश, एक योगी की आत्मकथा, सत्यनारायण पूजा के पर्चे के बचे हुए वर्क, दीमक खाई डायरियां, और यही सब.

"इन किताबों में क्या है माँ?" हम पूछते तो माँ कहती, "इसमें जग-दर्शन का मेला है."

"कैसे?"

तो माँ बताती, "इन साधारण आँखों से तो हम भगवानजी के दर्शन नहीं कर सकते ना, तो भगवान जी किताबों के ज़रिये हमें नयी नज़र देते हैं जिससे हम उसे देख सकें. तुमने पढ़ा था न कैसे जेम्स वाट ने चाय की केतली से निकलती हुई भाप में स्टीम इंजन के दर्शन किये थे, गाँधीजी ने प्लैटफॉर्म पर गिर कर अपने बेईज्ज़ती में अहिंसा के दर्शन किये थे, रामकिशना परमहंस ने विवेकानंद में भगवान के दर्शन किये थे, वह सब करने के लिए कहीं से तो उन्हें नयी नज़र मिली...वर्ना सब लोग अपनी साधारण आँख से इनसे बहुत पहले यह दर्शन नहीं कर लेते?"

बात तो पते की थी. जेम्स वाट से पहले किसी ने केतली से निकलती हुई भाप में स्टीम इंजन के दर्शन क्यों नहीं किये? सभी लोग कभी ना कभी बेईज्ज़त होते हैं, पहले भी हुए होंगे ही, पर उनमे किसी को अहिंसा या आज़ादी के दर्शन क्यों नहीं हुए? रामकृष्णा परमहंस ने विवेकानंद में ऐसा क्या और कैसे देख लिया?

मैं माँ के पीछे पड़ जाता. "बताओ माँ, मुझे भगवान जी किस किताब के ज़रिये दर्शन देंगे?"

माँ कहती, "वह तो तुम्हें खुद ही ढूंढनी पड़ेगी. बस हमेशा मुक़द्दस, और कल्याणकारी किताबें पढ़ते रहो, तुम्हें तुम्हारी किताब ज़रूर मिल जाएगी. वह तुम्हें तुम्हारा सही नज़रिया देगी."

मैंने माँ की अलमारी की सारी किताबें पढ़ी. फिर पागलों की तरह कॉलेज में, क्लास में, यहाँ-वहाँ, सफ़र में, देश-विदेश में किताबें, रिसाले, पर्चे और अखबार पढ़े. दुनिया भर की मुक़द्दस और कल्याणकारी किताबें जमा की, सहेजी, सम्हाली. यहाँ तक की मेरे कम्प्यूटर पर सैकड़ों किताबें मौजूद हैं. इन्टरनेट पर मेरी कल्पना से भी अधिक किताबें मौजूद हैं, पर मैं आज भी अपनी किताब ढूंढ रहा हूँ और सोच रहा हूँ कि इतना पढने के बाद भी मैं अपनी माँ की व्यावारिक बुद्धि के धरातल को भी नहीं छू पाया. पता नहीं किस किताब से, किस टीचर से पाया था उसने वह मुक़द्दस और कल्याणकारी नज़रिया, "जग दर्शन का मेला!!"

2 comments:

Amit Mathur (1990 batch Arts) said...

प्रणाम माँ. बस और कुछ नहीं कह सकता.

Anjini said...

Maybe you will find "that" book someday. मुझे यह blog पढ़ कर कबीरदास जी का दोहा याद आ गया :
"पोथी पढ़ पढ़ कर जग मुआ, पंडित भयो न कोय ,
ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय "
आपकी माँ का प्रेम स्वभाव जो हम आप में देखते हैं,
उस डिग्री से बड़ी कोई डिग्री नहीं है इस दुनियां में.