Sunday, April 11, 2010

चली-चली रे पतंग मेरी चली रे

बीवी ने डाटा, "यह क्या बात है, अगर मैं घूमने नहीं जा सकती तो आप भी घर में पड़े रहो? जाओ घूम कर आओ ना." अगर उसने "आप भी घर में पड़े रहो" की जगह "आप भी घर में रहो" कहा होता तो शायद मैं घूमने नहीं जाता. पर "पड़े रहो" के उलहाने में इतना दम है कि कोई बिलकुल बेगेरत इन्सान ही इसे सुन कर पड़ा रह सकता है. मैंने सोचा इतना गिरा-पड़ा तो नहीं हूँ मैं, तो बस वाकिंग शूज़ पहने और चल दिए ओर्टेगा पार्क.

ओर्टेगा पार्क घर से मुश्किल से आधा मील भी नहीं है, पर कुछ गरमी ज्यादा थी, कुछ उमस भी थी; तो वहां तक पहुँचते-पहुँचते हांप गए. ध्यान आया कि पानी कि बोतल ले आनी चाहिये थी. पर देर से आई समझ का क्या लाभ? फिर याद आया कि पार्क के साथ जो स्कूल है, उसमे water fountain है, तो धीरे-धीरे उधर की तरफ चल दिए. शुक्र है कि water fountain चालू था, पर दिक्कत यह थी कि मुझे जानवर कि तरह पानी कि धार को लपड-लपड पीना नहीं आता. तो मैंने एक हाथ से water fountain चलाया और दुसरे हाथ को ओक बना कर थोडा थोड़ा पानी ले कर पीने लगा. उधर से एक परिवार चला आ रहा था: पापा, मम्मी, बेटा और बेटी. बेटा कोई १०-११ साल का रहा होगा. मुझे उस तरह पानी पीता देख कर उत्साहित हो कर बोला, "मम्मी, मम्मी देखो यह अंकिल बाबाजी की तरह से पानी पी रहें हैं." उसके पापा-मम्मी ने मुझे देखा, मम्मी को आभास हुआ कि मैं हिंदी समझता हूँ, तो उसने थोडा सकुचा कर, मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखा. मुझे मुस्कुराता हुआ पा कर कहने लगी, "सॉरी, यह ऐसे ही कुछ भी बोलता है." इससे पहले कि मैं कुछ कहता, छोटी बेबी ने बोल उठी, "नहीं मम्मी, दादा ठीक कह रहा है, यह अंकिल बिलकुल बाबाजी की तरह से पानी पी रहे थे." उनकी भाषा और व्यवहार से यह तो निश्चित था कि वह लोग उत्तर भारत के हैं, पर बेबी के भाई को दादा कहने से मैंने अनुमान लगाया कि वह लोग शायद मेरे प्रान्त उत्तर प्रदेश के हों. मैंने हंस कर कहा, "बच्चों ठीक कह रहे हो, दुनिया भर के बाबाजी लोग ऐसे ही पानी पीते हैं." बच्ची को पता नहीं क्या लगा कि वह दौड़ के मेरे पास आ गयी और पूछने लगी, "आप भी बाबाजी हैं?" मैंने कहा, "बिलकुल!" तो वह खुश हो गयी.

यह तो मुझे समझ में आ गया था कि यह बच्चे भारत में पैदा हुएं हैं, थोडा समय पहले यहाँ आयें है इसलिए इनकी हिंदी इतनी अच्छी है, और इनके बाबाजी या तो इनके साथ हैं, या फिर इनको विजिट कर के वापिस गए हैं. थोडी देर के दुआ-सलाम के दौरान पता लगा कि वह वर्मा फॅमिली कानपूर की हैं और यहाँ पिछले एक साल से हैं. क्योंकि वह लोग घर में हिंदी बोलते हैं, और बच्चे स्काइप पर अपने ग्रैंड-पैरेंट्स से बराबर बात करते हैं इसलिए उनकी हिंदी अभी भी जिन्दा है. हाँ, उनके बाबाजी गर्मियों में आये थे तो हर दिन घूमने पार्क में आते थे, और जैसे अभी मैं पानी पी रहा था वैसे ही पीते थे. मुझे वैसे ही पानी पीते देख कर और वैसी ही हिंदी बोलते सुन कर बच्चों को लाजिमी था कि अपने बाबाजी याद आ गए.

खैर, दो मिनट की औपचारिक बात-चीत के बाद मैंने फिर से अपनी वाकिंग चालू की. वर्मा परिवार स्कूल के परिसर की और चला गया और मैं बच्चों के झूलों की तरफ. थोडा आगे जाते ही मैंने देखा की कुछ वृद्ध ओरिएण्टल लोग ताई-ची कर रहे थे. मैं सामने गुलाब की क्यारी के पास की बेंच पर थोडा सुस्ताने बैठ गया. मन में विचार आया कि बच्चे तो अब मुझे बाबाजी कहते ही हैं, मुझे अब ताई-ची ज्वाइन कर ही लेना चाहिए. देखा दूर स्कूल के ग्राउंड में वर्मा परिवार पतंग उडाने की तैयारी कर रहा है. मन में आया कि चलो वापिस चलते हैं, आज के लिए वाक् काफी हो गया.

जब तक मैं वापिस स्कूल के पास पहुंचा तो देखा कि मिसेज़ एंड मिस्टर वर्मा, दोनो एक-एक पतंग उडा रहें हैं. मिसेज़ वर्मा सुपरमैन वाली पतंग उडा रही थी, और दादा उनके साथ था, मिस्टर वर्मा बटर-फ्लाई वाली पतंग उडा रहीं थी और बेबी उनके साथ थी. मेरे चहरे पर मुस्कराहट आ गयी. कितना खुश परिवार है. तभी बेबी ने मुझे देखा तो किलकारी मार कर हंसी. फिर पता नहीं क्या सोच कर, दौड़ते हुए मेरे पास आई और हाथ पकड़ कर खींच कर अपने पापा-मम्मी की तरफ ले गयी. पूछने लगी, "बाबाजी आपको पतंग वाला गाना आता है?" वैसे तो मुझे वक्त पर कोई चीज़ अचानक याद नहीं आती, पर पता नहीं कैसे मुझे अपने बचपन का पतंग वाला गाना याद आ गया. मैंने कहा , "हाँ! आता है."

पूरे वर्मा परिवार ने कोतुहल से मेरी और देखा. मैंने हँसते-हंसते एक लाईन गाई, "चली-चली रे पतंग मेरी चली रे." बेबी का चेहरा चमक उठा, और उसने भी गाने में अपना स्वर मिला दिया. मैंने देखा की दादा के भी होठ हिल रहे हैं. अब यह एक अच्छा इतेफाक था कि उनके बाबा जी भी यह गाना गाते थे. बेबी कहने लगी, "मम्मी, मम्मी! छोटे बाबाजी तो बाबाजी से भी अच्छा गाते हैं."

थोडी देर बच्चों से बात करके, फिर मिलने का वादा करके मैं वापिस घर कि ओर चल दिया. रस्ते भर सोचता रहा कि वाकई मैं चाहूं या नहीं, मदर नेचर तो मुझे बाबा बना ही दिया. मेरे अपने बच्चे अभी भले ही बच्चों के लिए तैयार हों या न हों. पर मैं तो बन गया छोटा बाबा! यह कोई इत्तेफाक है? शायद नहीं.

घर पहुंचा तो बीवी ने मेरा दमकता हुआ चेहरा देखा और कहने लगी, "देखा मैं कह रही थी ना कि घूम के आओ तो फ्रेश फील करोगे, कितने खुश नज़र आ रहे हो." मैंने हंस कर कहा, "सच कह रही हो छोटी दादी!.. चली-चली रे पतंग मेरी चली रे."

बीवी ने मेरी ओर अचरज से देखा, "हें! बौरा गए हैं क्या?"

मैंने कहा, "हाँ बेग़म, अब तो आये हैं बौराने के दिन, हमारे-तुम्हारे! घुटने का दर्द कैसा है तुम्हारा, छोटी दादी?"

1 comment:

Suman said...

nice