Saturday, May 22, 2010

जो सोया सो रोया

जब पहली
बार मैंने तुग़लक के बारे में सुना था तो मैं सात-आठ साल का रहा होऊंगा. उन दिनों मेरे पिताजी का तबादला बनारस से गाज़ीपुर का हो गया था. हम सब बनारस में बहुत आराम से रह रहे थे, और यह मेरे बड़े होने के बाद का पहला मौका था जब हमारा परिवार एक जगह से दूसरी जगह जाने की बात कर रहा था. यदि आपका कोई अनुभव रहा है जब आपके परिवार को lock-stock-n-barrel के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान स्थान्तरित होना पड़ा हो, तो आप जान सकेंगे कि हम किस मनःस्थिति से गुज़र रहे थे.

मुझे यह ही समझ में नहीं आ रहा था कि जब मेरा स्कूल 'इत्ता-अच्छा' है, अपना घर 'इत्ता-अच्छा' है, 'अबी-अबी' तो भैया के दोस्तों ने मुझे अपने साथ गेंद-बल्ला खिलाना शुरू किया है, तो यहाँ से नई जगह क्यों जाएँ? फिर उस दिन मैंने सुना माँ पापा से कह रहीं थी, "आप भी ना जी, तुग़लक की तरह बात कर रहे हैं. आपको promotion और independent charge मिल रहा है तो आप जाइये, हम लोगों की दिल्ली उजाड़ कर दौलताबाद क्यों ले जा रहें है." माँ भी न कभी-कभी ऐसी भाषा में बात करती थीं की मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ता था. यह तुग़लक कौन हैं? उनका पापा के ट्रान्सफर से क्या मतलब? हम तो बनारस से गाज़ीपुर जा रहें हैं ना. तो, माँ बनारस को दिल्ली और गाज़ीपुर को दौलताबाद जैसा क्यों बता रहीं है? दिल्ली तो मुझे पता है, पर यह दौलताबाद कहाँ है? हो सकता है, अगर बनारस दिल्ली हुआ, तो गाज़ीपुर दौलताबाद हुआ. कौन जाने?
शाम को गेंद-बल्ला खेलते हुए जब भैया के सारे दोस्त लोग मुझे बच्चे की तरह ट्रीट करने लगे तो मुझे लगा की मुझे कोई ऐसी बात कहनी होगी की जिससे इन लोगों को यकीन हो जाये की मैं बड़ा हो गया हूँ, और हो सकता है फिर वह लोग फील्डिंग के साथ-साथ मुझे बेटिंग करने का भी चांस दे दें. तो बिना किसी रेफेरेंस के मैंने कहा की "पता है हमारे पापा हम सबको गाज़ीपुर ले जा रहें है बिलकुल तुग़लक की तरह." भैया मुझसे छह साल बड़े हैं, उन्हें पता था तुग़लक कौन था और उनकी समझ में ही नहीं आया कि मैं यह कह क्या रहा हूँ. सारे दोस्तों के सामने मेरी ऐसे अल्लल-टप्प बात सुन कर वह झुंझला गए. "पता नहीं कहाँ से क्या सुन लेता यह संजय, फिर बिना सोचे-समझे कुछ का कुछ बोलता रहता हैं." मैंने भी अड़ गया, "नहीं, मैंने खुद सुना, माँ कह रही थी."
भैया को और कुछ तो समझ में आया नहीं, कहने लगे, "चल हट! ऐसा माँ क्यों कहेंगी? चल माँ के पास."

"चलो!" मैं भी अड़ गया.

भैया ने गुस्से में तीनों विकिट उखाड़ कर बगल में दबा लिए. खेल हुआ एकदम से बंद, सारे दोस्त चुपचाप चले अपने-अपने घर, और हम दौनों लाल-मुँह लिए वापिस अन्दर के आंगन में पहुंचे, जहाँ भैया ने माँ से मेरी शिकायत लगाई. माँ ने मुझे बुलाया और पूछा, "क्यों रे, क्या हुआ? क्या बोला भैया के दोस्तों से?"

मुझे लगा की आज कुछ गड़बड़ हो गई. पता नहीं क्यों जब-जब मैं सच बोलता हूँ, ऐसा ही क्यों होता है. मैंने भी ख़ूब तेज़ी से अपनी तरह से सारी बात बताई कि "असल में" हुआ क्या था.

अजीब से बात हुई. मेरी बात सुन कर माँ हंसने लगी. बोली, "पता भी है तुग़लक कौन था?"

"तुम बताओगी नहीं तो मुझे कैसे पता चलेगा?" मैं रुआंसा तो था ही, बिलकुल रोने-रोने को हो गया.

"अच्छा, जाओ, हाथ-पाँव धो कर खाना खा लो. मैं रात में तुम्हें तुग़लक कहानी सुनाऊँगी."

भैया ने कहा, "माँ, समझाओ ना इसको. मेरे सारे दोस्तों के सामने..."

"अच्छा-अच्छा. मैं समझा दूँगी."

मैं रोते-रोते हाथ-पाँव धोने चला गया.
वह रात मैंने मोहम्मद बिन तुग़लक के साथ बितायी. माँ इतनी अच्छी कहानी सुनाती थी कि लगा तुग़लक एकदम से नज़रों के सामने आ गया.

"एक बार, बहुत पहले दिल्ली में एक पागल सुल्तान था. जो सोचता था, वही करता था. किसकी हिम्मत कि रोक ले. एक बार उससे किसी ने एक सुनार की शिकायत की वह सुनार कहता फिरता है 'सुल्तान क्या चीज़ है? अरे! देश में तो सिक्का तो मेरे सोने का चलता है. देश तो सुनार ही चला रहा है. सुल्तान तो नाम का है.' बस यह सुनना था की पागल सुल्तान का तो सिर फिर गया. बोला, 'हिंदुस्तान का सुल्तान कौन है? मैं या वह सुनार?' बस वह दिन का दिन कि सुल्तान ने देश में सोने के सिक्के कि जगह चलवा दिया चमड़े का सिक्का."

"चमड़े का सिक्का कैसा होता है, माँ?"

"अरे, न किसी ने पहले कभी देखा ना सुना. अब कहीं नहीं होता चमड़े का सिक्का. बस वह तो सुल्तान का फरमान था तो कुछ दिन चल भी गया."

"फिर?"

"फिर, धीरे-धीरे सारे सोने के सिक्के वापिस आ गए. वही अशर्फी, और वही दीनार."

"माँ, तुमने मुझे कब्बी भी कोई अशर्फी, दीनार नई दिकाई." जब माँ मुझे सुलाते-सुलाते कहानी सुनाती थी तो मैं छोटा बच्चा बन जाता था.

"तुम जब बड़े हो कर अच्छे काम करोगे तो भगवान जी तुम्हें अशर्फी, और दीनार देंगे."

"अच्छा! फिर?"

"फिर?"

"फिर सुल्तान का क्या हुआ?"

"अच्छा, सुल्तान का हुआ यह कि पश्चिम से तुर्क, उत्तर से मंगोल और मुग़ल राजा और लुटेरे आते थे और दिल्ली में लूट-पाट करते थे. सुल्तान कुछ भी नहीं कर पाता था."

"फिर?"

"फिर, सुल्तान ने सोचा कि अगर वह अपनी राजधानी दिल्ली की बजाय कहीं दक्खिन में ले जाये तो लुटेरे वहाँ तक आसानी से नहीं पहुँच पाएंगे."

"अच्छा! फिर?"

"फिर, बस वही पागलपन. सुल्तान का फरमान जारी हो गया की फलां-फलां दिन दिल्ली के सभी आम और ख़ास का तबादला दौलताबाद होगा."

"तबादला क्या?"

"ट्रान्सफर."

"ओह! जैसा हमारा हो रहा है."

"हाँ वैसा ही."

"फिर लोगों ने कहा नहीं कि हम नहीं जायेंगे, जैसे तुम कह रहीं थी"

"बेटा यही तो फर्क है. पापा से तो बात कर लो और वह सुन भी लें. पर उस पागल सुल्तान से कौन कहे और किसकी बात वह सुने? बस मन ने आया तो आया. सबको जबरदस्ती ले गया तुग़लकबाद."

"तुग़लकबाद नहीं माँ, दौलताबाद!" मैंने टोका. माँ को जब नींद आने लगती थी तो कुछ का कुछ बोलती थी.

"हाँ, हाँ वही. सबको ले गया दौलताबाद. यहाँ तक की कुत्ते-बिल्ली को भी ले गया. आधे तो रास्ते में ही मर-खप गए. कोई लंगड़ा आदमी किसी तरह से एक टांग पर घिसटता हुआ दौलताबाद पंहुचा. बीमार चीखते-चिल्लते पहुंचे. पर बेरहम सुल्तान को रहम नहीं आया."

"माँ, हमको भी घिसटते-घिसटते गाज़ीपुर जाना पड़ेगा?"

"नहीं बेटा, तुम्हारे पापा कोई तुग़लक हैं क्या?"

"फिर तुम उनसे कल ऐसा क्यों कह रही थी की आप तुग़लक की तरह बात कर रहे है."

"बेटा, घर में तो बहुत से बातें होती रहती है. पूरी बात सुने बगैर बाहर जा कर ऐसी ही थोड़ी न बोलते हैं. अच्छे बच्चे तो सोच-समझ कर बोलते हैं."

"अच्छा माँ!"

"तो अब सो जाओ."

उस दिन तो मैं तुग़लक के बारे में सोचते-सोचते सो गया. बहुत सारे से दिन बीत गए. मैंने इतिहास में १४ वीं शताब्दी के मुग़ल सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक के बारे में पढ़ा. इतनी मजेदार कहानी किसी और सुल्तान की नहीं थी. बहुत मज़ा आया. फिर जब और बड़े हुए तो एक दिन ऐसा आया कि मुझे स्वम अपनी राजधानी को यू पी से दिल्ली ले जाना पड़ा. पढाई का मामला था, ज्ञान तो माँ दे दें, पर विज्ञान पढ़ने मुझे दिल्ली जाना ही पड़ा. पढ़ने गए थे विज्ञान के मंदिर आईआईटी में, पर वहाँ मुलाकात हुई बहुत से नए लोगों से, जिनमे से कुछ का कोई दूर-दूर तक विज्ञान से कोई ताल्लुक नहीं था. उनमे कोमरेड भैया भी एक थे. उनका शौक नाटक, उनका काम नाटक पर विरोधभास देखिये. वह निवास करते थे विज्ञान के मंदिर आईआईटी के विध्याचल हॉस्टल में. माओ के बारे में, चर्चिल के बारे में, नेहरु और लोहिया के बारे में कोमरेड भैया को सब पता था. सिर घुटा कर उस पर लाल पेन से कुल्हाड़ा-हंसिया बना कर, लाल कपड़े पहन कर जब वह हॉस्टल के कमरे से बाहर निकलते थे तो सब उन्हें या तो "तुग़लक" या "चो (रामास्वामी)" के नाम से पुकारते थे. सबको पता था कि मुझे इतिहास पढ़ने का जूनून है, तो सब मुझसे तुग़लक के बारे में पूछते थे और मैं खोज-खोज कर तुग़लक की कहानियां सुनाया करता था. हमारा पूरा ग्रुप "चो-तुग़लक" के नाम से जाना जाता था.

फिर एक दिन सुना की हल क़ाज़ी गिरीश कर्नाड का ड्रामा तुग़लक के कर जा रहे हैं. काजी साब का निर्देशन और गिरीश कर्नाड का नाटक, वह भी कमानी ऑडिटोरियम में. इसे देखने तो जाना ही जाना है. पर टिकेट खरीदने पैसे किसके पास हैं? पैसे होते तो बीडी की जगह सिगरेट न पीते और टेस्टी-टोस्ट की जगह मुगलाई परांठा न खाते? ऐसे में कोमरेड भैया बहुत काम आते थे. पता नहीं क्या-जुगाड़ किया कि हम सब जा पहुंचे तुग़लक का ड्रेस रिहर्सल देखने. नीचे के थिएटर में बोरा बिछा कर हम सब पसर गए और करीब चार घंटों तक, जब तक ड्रेस-रिहर्सल चलता रहा, चुपचाप बैठे सम्मोहित से देखते रहे. मैं एक बार भी बाथरूम जाने के लिए नहीं उठा. यह बात उस बात के सामने फीकी पड़ गई कि 'चो' को सारे समय में एक बार भी सिगरेट पीने कि तलब नहीं हुई. एक बार भी नहीं--कमाल ही हो गया. हममे से कोई भी रात में ठीक से सो नहीं सका. लगा इतिहास में वापिस पहुँच गए.

"अरे! काजी साब खुद उठ कर हम लोगों के पास आये, पूछा आप आई-आई-टी वालों को कैसा लगा?"

"पहली बार लगा कि सुल्तान उतना क्रूर और पागल नहीं था जितना हमारी इतिहास कि किताब में बताया गया था."

फिर तो बीती रात के अधजले माहौल में एक जुनूनी, इखलाकी, तारीखी और फलसफे से भरा लम्बा वाद-विवाद छिड़ गया.

मैं तो यह सब भूल भी गया था पर याद आ गया, जब कुछ दिन पहले मेरे करीबी दोस्त अरविन्द भाई ने मुझे बताया कि नाटक वाले तुग़लक का मंचन कर रहें है.

"कब? कौन कर रहा है निर्देशन? तुग़लक कौन बन रहा है?" मेरी तो बचपन और जवानी जैसे लौट आई.

पता चला कि नाटक का प्रोडक्शन तो प्रदीप जी कर रहें है. मनीष साबु कर रहे है निर्देशन.

"अच्छा! और कब है मंचन?"

"जून में? यहाँ? बे एरिया में?"
मैं इतना उत्तेजित रहा हूउँगा कि मेरे शोर से ऊपर से परितोष नीचे आ गया और किचेन से रीना.

"क्या हुआ?"

"अरे, प्रदीप मौसाजी गिरीश कर्नाड के तुग़लक का मंचन यहाँ बे एरिया में कर रहे हैं."

"अच्छा वही तुग़लक जो आपने अपने आई-आईटी के टाइम में देखा था?"

"वही!"

"तो यहाँ के लोगों को कुछ पता भी होगा उसके बारे में?"

"अगर भारत में बड़े हुए हैं, और उन्हें इस बात में रूचि है कि कैसे किसी सिरफिरे मगर दूरंदाज़ लीडर की दूरंदाज़ी से किसी मुल्क को क्या फर्क पड़ता है, तो वह इस नाटक को देखने के लिए ज़रूर उत्साहित होंगे."

मैंने देखा कि परितोष बहुत ध्यान से मेरी बात सुन रहा है. यहाँ पैदा हुआ है, पर उसने तुग़लक के बारे में सुना है. वाह! अगर उसकी तरह से और भी नौजवान लोगों ने तुग़लक के बारे में सुना है तो शो तो हाउस-फुल जायेगा. अरविन्द भाई ने बताया कि इस नाटक में इंग्लिश सब-टाईटिल होंगे ताकि नौजवान और हिंदी-उद्रू ना बोलने वाले भी इसका मज़ा उठा सकें. और, इस बार नाटक तुग़लक के सात-सात मंचन कर रहा है."

"कब, कहाँ?"

"आप भी संजय भाई! बच्चों की तरह बात करते हैं. अरे Visit http://www.naatak.com/current_event.html और टिकेट बुक करा लें. यहीं सेन-होज़े में कोजी-सा थिअटर है, वहीँ. अभी खरीदेंगे तो अच्छी सीट मिलेगी, वर्ना बोरे पर बैठ कर देखने का मौका पता नहीं मिले या न मिले. आप ही कहते हैं न, 'जो सोया सो रोया' "

"अच्छा! मेरा तेल मेरे ही सिर?"

"जो आपसे पाते हैं, वही तो देंगे आपको."

अरविन्द भाई से कौन जीते? आप भी टिकेट बुक करा लें ना. देखे तुग़लक शाही अंदाज़ में. वहीँ कहीं मैं आपको बोरे पर बैठा मिलूंगा. सच्ची!

5 comments:

Rajiv Nema said...

संजय जी, किस अदा से आप कहानी किस्से सुनाते हैं. भई वाह. बहुत खूब. आपकी मम्मी ने यह आपको विरासत में दी है. मज़ा आ गया. मैं यह blog अपने दोस्तों के साथ बाटूंगा.

Amit Sharma said...

kya baat hai, bahaut badhiya lekh likha hai.

Sunny Moza said...

Kaabile-taareef, Sanjayudeen!!

प्रतिभा सक्सेना said...

पढ़ कर बहुत मज़ा आया-आपका लेखन बहुत सहज-स्वाभाविक है -जैसे सामने घटित हो रहा हो .
हाँ,मैं कानपुर की हूँ-आप भी भी हैं सुन कर और अच्छा लगा .

Palak Mathur said...

बहुत मज़ा आया पढ़ कर। गद्ध पढ़ने का यही मज़ा है कि सब कुछ सामने घटित होता प्रतॊत होता है।