Monday, May 10, 2010

जैसी हरि-इच्छा

माँ कहानी सुनाती थी तो आँखों के सामने जैसे चलचित्र-सा बन जाता था. कहानी के किरदार मेरी आँखों के सामने कहानी जीते दिखाई देते थे और लगता था कि मैं भी कहानी से जुड़ गया हूँ. कभी माँ कहानी सुनाते-सुनाते भावुक हो जाती और कहानी के किरदार की त्रासदी पर दो आंसू बहा लेती. मैं भी रोने लगता तो कहती, "हट, कोई ऐसे रोते हैं? यह तो कहानी है." पर मेरा मन नहीं मानता था. ऐसे सच्चे किरदार सिर्फ कहानी में ही नहीं हो सकते. मेरे लिए तो वह जीते-जागते इंसान थे, और एक बार जो कहानी से चल कर मेरे जेहेन में आ जाते, तो फिर वहीँ घर कर लेते थे. कुछ तो आज भी मेरे साथ हैं. उनमे ही एक हैं सत्यदेव जी.

सत्यदेव बेचारे गरीब से किसान थे, पर कुछ बातें दूसरे गाँव वालों से एकदम अलग थीं. माँ बताती थी कि चाहें सत्यदेव जी कि जान पर ही क्यों न बन आये, मजाल है कि वह झूठ बोल दे. वह एक छोटे-से, मझोले कद वाले, देखने में एक दम से साधारण से दिखने वाले गवईं से इंसान थे. पर उनमे था बला का इखलाक और चेहरे पर था सत्य का तेज. कितनी बार ऐसा हुआ कि सत्यदेव ने सच का साथ दिया और अपना बहुत सारा सा नुकसान कर लिया. पर कभी सच से डिगे नहीं.

माँ मेरे बालों में हाथ फेरती रहती और कहानी सुनाती जाती. मैं "हूँ-हूँ" करके, "फिर क्या हुआ" "तो फिर" या "अच्छा" कर-कर के कहानी आगे बढाता जाता. मुझे पता है आप कह रहे हैं, "अच्छा! ठीक है, यह तो सभी बच्चे करते हैं, आगे बताओ." अब आप कह रहे हैं तो सुनिए. बीच-बीच में हूँ-हूँ का हुंकारा करते जाईयेगा ताकि मुझे पता चले कि आप ऊँघ नहीं रहे और कहानी सुन रहे हैं.

तो कहानी तेज़ी से आगे बढती. माँ को कहानी ख़त्म करके और काम भी तो करने होते थे. तो बस, सुनिए. सत्यदेव जी की दो सुन्दर-सुघड़ सी लड़कियां थी जिनका ब्याह अपनी औकात के मुताबिक सत्यदेव और उनकी पत्नी ने किया. एक को मिला पास के गाँव का कुम्हार और दूसरी के पति उसी गाँव में एक और किसान का लड़का. मैं कहता, "अरे माँ, सत्यदेव जी की दो लडकियां थीं, और उनकी शादी हो चुकी थी. तो फिर तो सत्यदेव जी बूढ़े से दीखते होंगे."

"नहीं, सत्यदेव जी के पास था सत्य का तेज. कौन कह सकता था कि वह ४५-५० साल के हैं? सादा खाना खाते थे, ताज़ा दूध-दही पीते थे. मेहनत करते थे, और भगवान के भजन करते थे. इसलिए देह के और मन के मज़बूत बन्दे थे."

"अच्छा!" और मेरे माँ में सत्यदेव जी का खाका खिच जाता. आज भी अगर वह सामने आ जाएँ तो मैं उन्हें हजारों में पहचान लूँगा. चलिए वापिस कहानी पर चलते हैं. उस साल, जब भादों कि बदरी छाई, सत्यदेव की पत्नी की आँखे भर आई. कहने लगी, "चलो, चल के देख के आयें कि मेरी प्यारी बेटियां कैसी हैं. अपने ससुराल में खुश तो हैं न. यहाँ होती तो अमराई में झूला डालते. कितना पसंद था बडकी को झूला झूलना. और छोटी कैसा प्यारा गाती थी झूले के गीत! सच मैं तो अकेली हो गई बडकी-छुटकी के ब्याह के बाद." माँ यह बताते-बताते भावुक हो जाती. फिर एक ठंडी सांस ले कर कहती, "बेटियों को तो एक ना एक दिन दूसरे घर जाना ही होता है, और जब बेटी विदा हो कर अपने घर चली जाती है, तो उसके माँ-बाप का मन तो सावन-भादों की बदरी की तरह भर ही आता है."

मुझे लगता है माँ को अपनी विदाई या फिर एक न एक दिन भविष्य ने होने वाली बेटियों की विदाई शूल की तरह मन में चुभती थी और वही चुभन कहानी सुनाते-सुनाते आंसू बन कर व्यक्त होती थी. आज तो मैं इतना सोच सकता हूँ, पर तब? तब तो बस मैं कहानी की रवानी में बहता चला जाता था.

कहानी में डूब कर, आप ही तरह, मैं भी कहता, "तो फिर?"

"फिर, सत्यदेव जी को भी अपनी प्यारी बिटियाएँ याद हों आई. और उन्होंने ठान लिया की आज तो उनसे मिल के ही आते हैं. तो सतदेव जी और उनकी पत्नी तैयार हो कर घर से बाहर निकले."

"सतदेव नहीं, माँ! सत्यदेव."

"हाँ, हाँ, वही. एक ही बात है."

पर मेरे माँ में तो सत्यदेव जी का तसव्वुर पूरा बन चुका होता था. "एक बात कैसे हैं? माँ!"

"अच्छा तो चलो, सतदेवजी नहीं, स त्य दे व जी तैयार हो कर, जो भी घर में था अनाज, घी, मिठाई ले कर पहले चले बडकी से मिलने. बडकी का गाँव था दूर और सिर पर थी भादों की धूप, जिसमे हिरन भी काला हो जाये. कभी बदरी छा जाये तो कुछ चैन आ जाये, वरना फिर चिलचिलाती धूप. दुपहर होते-होते, बादल घिर आये और एक-आध बूँद भी पड़ गई. किसी तरह चलते-चलते, थके-हारे, वह दोनों बडकी के घर पहुचें. बडकी को तो जैसे विश्वास ही नहीं हुआ. हिरन के छौने की तरह हुलस कर दौड़ी आई और लग गई अपने माँ-बाप के गले. उसके ससुराल वालों ने भी ख़ूब अवोभागत की सत्यदेव और उनकी पत्नी की. शाम को मौका पा कर सत्यदेव ने बडकी से पूछा, "तू खुश तो है न. कोई कष्ट तो नहीं हैं तुझे यहाँ " तो बडकी बोली, "नहीं बाबा! मुझे कोई कष्ट नहीं है. सास तो माँ जैसी है और पिता जी आप जैसे. यह तो इतने सीधे हैं की क्या बताऊँ. चुपचाप बस रात-दिन बरतन बनाते रहते हैं. मैं अपनी सास माँ के साथ जा कर हाट में बर्तन बेच देती हूँ. उस कमाई से घर बहुत अच्छी तरह चल जाता हैं. बस आप एक काम कीजियेगा कि जब आप पूजा करें तो भगवान जी से यह कहियेगा कि अभी कुछ दिन बरसात ना हो. इन्होने इतने अच्छे बर्तन बनाये हैं, जो अभी सूखे नहीं हैं. राखी के दिन बड़ा हाट लगेगा. अगर उससे पहले बरसात हो गई तो सारे बर्तन भीग जायेंगे और एक भी बिक नहीं पायेगा."

सत्यदेव जी ने कहा कि वह ज़रूर भगवान ने बडकी के लिए प्रार्थना करेंगे.

"तो फिर?" मैंने पूछा.

"फिर? फिर वहाँ से वह लोग चल पड़े छुटकी से मिलने. कहीं से वापिस आने का रस्ता तो वहाँ जाने के रास्ते से छोटा होता है न, तो वह दोनों शाम होते होते वापिस गाँव पहुँच गए. पहले सीधे गए छुटकी के यहाँ. छुटकी गाय को भूसा और खली खिला रही थी, देखते ही दौड़ी आई. उसके ससुराल वाले भी इतनी आवाजें सुन कर बाहर निकाल आये. शाम हो गई थी तो सब बाहर चबूतरे पर ही बैठ गए और फिर दुःख-सुख के चर्चे होने लगे. मौका देख कर सत्यदेवजी ने छुटकी से पूछा कि "तू खुश तो है ना बेटी?" तो छुटकी ने कहा "बहुत! ये तो इतने मेहनती हैं, सारा-सारा दिन खेत और खलिहान में जुटे रहते हैं. बस, आप भगवान से यह कहियेगा कि इस भादों बारिश जम कर हो, वर्ना सारी फसल चौपट हो जाएगी और फिर महाजन से उधर लेना पड़ेगा."

सत्यदेव जी ने छुटकी को भी पूरा विश्वास दिलाया कि वह ज़रूर भगवान ने उसके लिए प्रार्थना करेंगे.

सत्यदेव कि पत्नी को मन में तभी खटका हुआ कि ये कैसे बडकी और छुटकी के लिए भगवान से प्रार्थना करेंगे? एक को चहिए बारिश ना हो, एक को चहिए कि ख़ूब जम के बारिश हो. ये दोनों बातें एकसाथ कैसे हो सकती हैं. पर वह बिचारी छुटकी के ससुरालवालों के सामने क्या बोलती? चुप रह गई.

यह सुन कर तो मैं भी सोच में पड़ जाता. बेचारे सत्यदेव जी. "तो अब सत्यदेव जी क्या करेंगीं, माँ? दोनों बातें तो नहीं हो सकती ना."

"हाँ. यही बात तो उनकी पत्नी को भी खाए जा रही थी. छुटकी के यहाँ से लौटते-लौटते रात हो गई थी और रस्ता ठीक से दिखाई नहीं पड़ रहा था, तो सत्यदेव जी ने अपनी पत्नी से कहा, "भागवान. मेरे पायेंते-पे-पांयता रखते हुए सावधानी से चलती चलो.""

"माँ! पायेंते-पे-पांयता क्या?"

"जहाँ-जहाँ मैं पैर रक्खूं, वहीँ तुम भी रखो, तो हो गया पायेंते-पे-पांयता."

"अच्छा! फिर?"

"फिर! सत्यदेव के पायेंते-पे-पांयता रख कर चलते हुए उनकी पत्नी बोली, "सुनिए जी? आप बडकी और छुटकी दोनों के लिए एक साथ कैसे भगवान से प्रार्थना करेंगे?"

सत्यदेव जी बोलो, "हाँ! कठिन तो हैं, पर मैं कोशिश ज़रूर करूंगा."

"कोशिश? आपने तो दोनों को वादा किया कि उनके लिए आप भगवान से प्रार्थना करेंगे. आप तो कभी झूठ नहीं बोलते तो फिर?"

"नहीं, इसमें झूठ बोलने की क्या सवाल है?"

"तो फिर आप क्या कहेंगे भगवान से?"

सत्यदेव जी उस समय तो कुछ नहीं बोले. घर आ कर अपनी पूजा में भगवान जी के सामने बैठ गए और आँख बंद करके बोले, "भगवान! आज दोनों लड़कियों से मिले जा कर. दोनों आपने-अपने घर में खुश हैं. उन्हें खुश रखना. और हाँ, बडकी चाहती है की इस भादों में बारिश बिलकुल न हो. और छुटकी चाहती है की ख़ूब बारिश हो. तुम सर्व-ज्ञाता, सर्व-शक्तिमान परमेश्वेर हो, तुम्हें जो अच्छा लगे वह करो, हम तुम्हारी इच्छा को शिरोधार्य करेंगे."

मैं यह सुन कर चकरा गया. "यह क्या बात हुई माँ?"

माँ ने कहा, "देखो इस तरह सत्यदेव जी ने झूठ भी नहीं बोला. दोनों लड़कियों की बात भगवान जी तक पहुंचा दी और साथ-साथ हरि-इच्छा का सम्मान भी किया."

"तो फिर भगवान जी ने क्या किया?"

"जो भगवान जो को पसंद आया होगा वह किया होगा."

"क्या किया होगा?"

"जो हरि इच्छा. और हम सबको वह माननी पड़ेगी. बस उनके पायेंते-पे-पांयता रख कर चलना होगा."

तबसे आज का दिन है, मुझे कभी भी भगवान जी यह बात अच्छी नहीं लगी. जब भी इतनी अच्छी कहानी चल रही होती है, तो बीच में आ जाती है हरि-इच्छा. अब आप ही बताइए यह भी कोई बात हुई कि हमको हर हाल में हरि-इच्छा मनानी पड़ती है. माँ तो कहानी सुना कर सो गई, मेरी तो अब तलक बीच रात में नींद खुल जाती है, और देर तक सोचता रहता हूँ की उस भादों बरसात हुई होगी या नहीं? पता नहीं, पर जैसी हरि इच्छा!

आप पूछ रहे हैं कहानी खत्म? हाँ जी, कहानी खत्म! जैसी हरि इच्छा!

1 comment:

dr.aalok dayaram said...

मन चाहे क्या होत है हरि चाहे सो होत
आपकी मां बहुत ग्यानवान महिला थी। उनके हे संस्कार आज आप में प्रस्फ़ुटित होते दीख रहे हैं।
काम किये जा फ़ल की इच्छा मत रख रे इन्सान
ये है गीता का ग्यान।
आपने बहुत सुन्दर कहानी लिखी ।शुभ कामनाएं!