Sunday, September 18, 2011

My mini-Thesis: My creator is not an engineer

(Researched and composed on Sunday, 07/24/11 in Ramada Inn, Navi Mumbai)

Last month, when I was with my kids and generally talking about life, we stumbled on a thought that our creator was not an engineer. I am sure this was not a novel thought; anybody who could analyze a bit must have got to the same thought.

Well, I mean, if our creator wanted us to touch our toes for being healthy, flexible and active; and she was an engineer, she would have definitely designed our hands closer to our toes or vise-a-verse. Really, which architect/engineer would make a kitchen far away from the dining-area if he wanted the food from the kitchen to reach to the hungry people sitting in dining area quickly?  

Research by intro-inspection and observation:
While traveling, I had some free time, jet-lag and indigestion on my hands, so I analyzed this matter a little further. I got convinced. I realized God even defies physics and chemistry. He made our digestion based on acid, and yet the container he uses is so sensitive to acid. The acid hurts my throat, hurts my tongue, and eats up the lining of my stomach. If God was a student of science, she could have made my beaker, pipette and titration-set more robust. She had all the material in the world, why make my apparatus with soft tissue? Would any chemist store acid in a container that is a good solvent of the damn acid? Na-Nah! So, it appears that God has a little consideration for chemistry.

Also, I strongly remember my physics teacher telling me, “Gas is lighter than liquid and solid, and thus gas escapes from the top of a container, if it finds an escape.” Well, my pressure-cooker, tea kettle, and rice cooker always followed this rule. The steam and aroma always escaped from the top. These gadgets are made by engineers, so it is not surprising that they follow the basic rules of physics. However, my body does not follow the same rule. Gas in me not always escapes from the top of my head. Most of the time, it escapes from the bottom. Are you also in the same “boat?” Then, I get another proof-point. Man! God is not an engineer.

Because my creator is not an engineer, I was left to crawl when I was young. God knows how, but I, like you, figured out that crawling was not a very efficient way to reach anywhere. So, we start to walk, right? Parents clapping joyfully! “My son is not designed by an engineer. But, see how he figured out walking. Here, have a sweet. My son is beating all the odds.” Initial euphoria and rejoicing  was short-lived. Since I was not designed to walk, the line of balance did not always remained within the perimeter of my immature base, and I fell again and again, sometimes badly. With months of trial and error, and several bumps on my head, I figured out how to walk. Looking back and thinking very hard on this ordeal I ask myself if I was a car my designer would have been long gone – fired from her job. I mean, which automobile engineer makes a car that does not know how to drive, but has to experiment, improvise, collide with surrounding objects, and slowly and painfully learn how to drive? Now, are you with me? Man! I tell you, God is not an engineer.

Final Arguments:
Look at the mix-up, we have in our body. A tail-bone, which is not needed? An appendix, which can be fatal any time? Bones are stronger than heart? What? Our drainage systems mixed with entertainment system? Digestive system mixed with tasting system? Small ears, which we cannot turn? Eyes, which do not see who is gaining at us from behind? Mind, which is confused between facts and imagination? No, no! Our creator was not an engineer.

Based on the above research, observations, and intro-inspection, I have enough evidence to confirm my initial hypothesis,  “My creator  is not an engineer.”

My best Opinion:
You ask me if my creator is not an engineer, what is my best guess, what qualifications he or she has? In my humble opinion, at best, my creator is an adventurous, fun-loving, high-school dropout, who ventured in to manufacturing people for fun, without having adequate technical-training, certification and experience. The result is not bad for a non-engineer, eh?

Sanjay Mathur indogenius

Wednesday, June 22, 2011

कल कुछ इस तरह मुकम्मल हुई यह बात धीरे-धीरे. प्रज्ञा घर आयी हुई थी, और मैं उसके साथ बात करते-करते इस अशहार पर भी काम कर रहा था. उसने इसको फेसबुक पर कतरा-कतरा बनते देखा. मेरी सोच और भाव को पंक्तिबध्य करने की मर्यादा को भी देखा. अब वह बड़ी हो गई है, तो पूरी प्रक्रिया में भरपूर रूचि ली. आशा है कि काव्य की इस परंपरा का एक सिरा उसे सौंप पाउँगा, ताकि यह विधा परिवार में चलती रहे. शायद. भगवान ने अगर चाहा तो. तो सुनिए पूरी बात एक साथ:

बेताबी ही नहीं तो क्या मज़ा मोहब्बत का,
बुझते दिए से कहीं रोशन जहाँ हुआ है कभी?

क़ुरबानी ही नहीं तो क्या असर इबादत का,
नाफ़रमानी से जन्नत नसीब हुआ है कभी?

नाराज़गी नहीं ये तो शोशा है इश्क-मुश्क का,
बिना रूठे भी कोई माशूक बन पाया है कभी?

शीरीं जुबाँ नहीं तो क्या मज़ा गुफ़्तगूँ का,
कंटीले तार से भी कोई सितार बजा है कभी?

जगबयानी नहीं ये किस्सा है आश्नाई का,
संजय" ने कहीं यूँ ही कोई शेर कहा है कभी?

जन्नत............Equivalent to the concept of heaven
इश्क-मुश्क.......Poetic way of qualifying love as the fragrance of musk (Kasturi)
जग बयानी.......Telling the world, spreading stories

Wednesday, March 30, 2011

कहते हैं की यह भारत के स्वर्ण-काल के लगभग अंत की बात है. 'स्वर्ण-काल' धीरे-धीरे समाप्त हो रहा था, और उसकी जगह आ रहा था 'लाठी काल.' "जिसकी लाठी उसकी भैंस" जैसे मुहावरे सुनाई देने लगे थे. आचार्य और अध्यापकगण संस्कृति के साथ-साथ भ्रष्टाचार पर भी व्याख्यान देने लगे थे. लोग सोना चढाने की जगह, सोना घरों में गाढ़ने और छुपाने लगे थे, और मिलावट क्या होती है इस पर आम आदमी विचार करने लगा था.

उस काल में एक छोटा सा गाँव था, और वहाँ का था एक अदना-सा राजा. पर राजा तो राजा, चाहें कितनी छोटी रियासत ही क्यों ना हो. उसका खूब दबदबा था. जहाँ भी उसकी सवारी जाती, लोग झुक के सलाम करते थे. राजा स्वर्ण-काल के सात्विक विचारों वाला और सज्जन था. पर जैसा होता आया है, उसका मुँहलगा मंत्री या यूँ कह लें कि सेक्रेटरी लाठी-काल की विचारधारा से प्रभावित था. उसकी फिदरत ही, कहते हैं कि, बहुत चालबाज़ और चालाक आदमी की थी. मेरी अपनी राय तो यह है कि राजा में और उसके मंत्री में एक 'जनरेशन-गेप' था. मंत्री का ऐसा मानना था कि स्वर्ण-काल ने आदमी को मुलायम और लाचार बना दिया है, जबकि राजा का यह मानना था कि स्वर्ण-काल का जीवन-मूल्य अमूल्य हैं. पर जैसा होता आया है, राजा को गाहे-बगाहे मंत्री से सलाह लेनी पड़ती थी और अक्सर ना चाहने पर भी उसकी बात माननी ही पड़ती थी.

तो हुआ यूँ कि राजा कि हवेली में हुआ एक बड़ा-सा जलसा, और उसमे बनी खीर! अब राजा के घर की खीर, गाढ़ी ऐसी जैसे रबड़ी. खुशबू ऐसी कि जैसे गुलाब-जल. स्वाद? आ-हा-हा, क्या कहने! मंत्री ने खूब चाट-चाट के खीर खाई. फिर पास बैठी अपनी पत्नी से बोला, "ऐ जी, तुमने ऐसी खीर कभी क्यों नहीं बनाई? हें जी?" उस समय तो उसकी पत्नी चुप रही, घर आते ही ऐसी खरी-खोटी सुनाई की मंत्री के होश उड़ गए, "ऐसी खीर कभी नहीं बनाई-ऐसी खीर कभी नहीं बनाई? कभी अच्छा दूध ला के दिया है? मैं ही जानती हूँ कैसे-कैसे कर के यह पानी जैसा दूध गरम कर-करके बच्चों को पिलाती हूँ. ऐसे मूत जैसे दूध से क्या खीर बनेगी? दूधवाला दूध कम और पानी ज्यादा देता है. एक मेरे मैके में दूध आता था. तुम तो बस कहने को मंत्री हो. दूधवाला हमें पानी और राजा सब को रबडी खिलाता है. पर तुम्हें कुछ दिखे तब ना. सारा दिन, राजा साहिब-राजा साहिब करते रहते हो..."

मंत्री का माथा गरम हो हो गया, मूंछे फडकने लगी. तुरंत दूधवाले को बुला भेजा. बेचारा कृशकाय, दूधवाला झुका-झुका सा, कोर्निश करता दुबारी से घुसा ही था कि मंत्री ने आड़े हाथों लिया. "यह क्या बात है, दूधवाले? हमारे यहाँ दूध पानी जैसा देते हो? पता है हमें मंत्राणी जी से क्या-क्या सुनना पड़ता है?

दूधवाले ने कांपते हुए अर्ज किया कि "मंत्री महाराज, गाय सिर्फ 8 सेर दूध देती है. राजा साहिब के यहाँ ही ५ सेर की खपत है. वह क्या करे? जो तीन सर बचता है उसमे पानी मिला के किसी तरह ५ सेर करके आपके घर पहुंचता है. अब दूध बिना गाय के दिए तो बनाया जा नहीं सकता. गाय को ज्यादे दूध देने पे मजबूर भी तो नहीं किया जा सकता."

मंत्री ने सोच के कहा कि "नहीं ऐसे नहीं. ख़ाली हमारे यहाँ जो दूध आता है उसमे ही पानी क्यों मिलते हो? अगर मिलाना ही है तो सारे में पानी मिलाओ, फिर पांच राजा के यहाँ पांच हमारे यहाँ लाओ."

दूधवाले ने सोचा सस्ते छूटे. स्वर्ण-काल होता तो लगते जूते. तुरंत बोला, "हाँ जी हाँ, कल से जेई करून्ग्गा."

कल से मंत्री भी खुश और मंत्राणी भी. दूध हो गया गाढ़ा और बनने लगी खीर.

कुछ दिन मंत्री ने देखा राजा जी बहुत परेशान हैं. पूछा, "महाराज! क्या बात है?"

राजा जी कहने लगे, "कैसा ज़माना आ गया है. हमें लगता है कि हमारा दूधवाला दूध में मिलावट करता है."

यहाँ मैं आपको बता दूँ कि उन दिनों में 'मिलावट' एक नया शब्द था. बिलकुल ऐसे ही जैसे आजकल 'ओ एम जी' (ओह माय गोड!) हैं. कहने को तो ऑक्सफोर्ड की डिशनरी में आ गया है, पर यदि कोई बुज़ुर्ग उसे प्रयोग करे तो नौजवानों के कान खड़े हो जायें. हाँ तो वही हुआ ना. मंत्री को लगा जानबूझ कर राजा ने मिलावट शब्द का इस्तेमाल किया है वर्ना यह भी तो कह सकता था कि दूध पतला हो गया है. कहीं उसे कोई शक तो नहीं हो गया?

पर मंत्री भी कोई दूध का धुला तो था नहीं, और उसे ख़ूब पता था कि किसी को दूध में कैसे नहलाते हैं. तो भोला बन कर कहने लगा, "सचमुच, महाराज! अरे आपने पहले नहीं बताया. मैं उस दूधवाले की अभी खबर लेता हूँ."

राजा साहिब ने पलट कर पूछा, "कैसे?"

मंत्री सटपटाते हुए बोला, "दूधवाले की तहकीकात की जानी चहिए."

राजाजी ने कहा, "हाँ यह बिलकुल ठीक रहेगा. दरोगा जी को बुलाओ."

आननफान में दरोगा जी को बुलाया गया और उनको दूधवाले की जाँच पर बैठा दिया गया.

मंत्री जी लपक के घर पहुंचे और दूधवाले को बुला भेजा. वह डरता हुआ आया. मंत्री जी उसे दुबारी से सीदे मर्दाने कोठे में ले गए और आँख दिखाते हुए कहने लगे, "देख, तेरे ऊपर तहकीकात की जा रही है. कुछ भी कर, अगर मेरा नाम इसमें आया तो तेरी ख़ैर नहीं."

दूधवाला कहने लगा, "सरकार आप माई-बाप हो. जैसा कहोगे करूँगा. पर दूध तो सिर्फ ८ सेर ही निकलता है, क्या करूँ?"

मंत्री ने कहा, "मुझे नहीं पता. बस. मेरा नाम बीच में आया तो तू होगा और मेरी लाठी, बस चीर के रख दूँगा."

दूधवाला झुक के कोर्निश करता हुआ बाहर चला गया.

कुछ दिन बाद, मंत्री फिर राजा के सामने पड़ा, तो राजा गुस्से से आग-बबूला हो रहा था. "पता नहीं कैसा ज़माना आ गया है. जब से दरोगा को दूधवाले की तहकीकात के लिए बिठाया है, दूध तो एकदम से पतला हो गया. उसमे अजीब सी बू आ रही है. यहाँ तक कि कल रानी साहिबा को दूध पीने के बाद उलटी हो गई."

"अरे, अरे, राजा सहिब! यह तो बहुत ही बुरी बात है. मुझे लगता है कि दरोगा कुछ हेरा-फेरी कर रहा है.

यहाँ मैं आपको बता दूँ कि उस काल में हेराफेरी ऐसा नया शब्द था जैसा "ऐ एस ऐ पी" हो. जो जानता है उसके लिए रोजमर्रा का शब्द है पर जो नहीं जानता उसके लिए "राम जाने क्या है."

पर मंत्री जी तो हेरा-फेरी जानते ही थे. कहने लगे, "महाराज! मेरी मानो तो इस सारे किस्से को उजागार करने के लिए एक गुप्तचर को लगा देते हैं."

राजा जी को लगा बात तो सही है. अब गुप्तचर कहाँ से आये? तो इसमें भी मंत्री जी बहुत काम आये. उन्होंने अपने बेरोजगार भतीजे का इस काम के लिए नाम लिया और राजा साहिब ने मान भी लिया. चलो अच्छा हुआ, मंत्री ने चैन की साँस ली.

पर गुप्तचर के काम करते अभी तीन दिन ही हुए थी कि रानी जी की तबियत इतनी ख़राब हुई कि हकीम जी को रात भर राजा साहिब के हवेली में ही काटनी पड़ी. राजा जी का शक दूध पर गया. मंत्री जी की बत्ती गुल हो गई. तुरंत दूधवाले को बुला भेजा. वह कांपता हुआ आया, बेचारा डर और परेशानी से सूख कर कांटा हो गया था.

घर का दरवाज़ा बंद करके मंत्री जी ने कड़के, "अबे दूधवाले! तू भी मरेगा और हम सबको मरवाएगा. क्या मिलाया दूध में?"

दूधवाला रोने लगा, "सरकार, हम आपको बताये थे ना, दूध तो सिर्फ ८ सेर ही निकलता है. आप मालिक लोंगों को देना पड़ता है २० सेर. तो हमारी घरवाली ने चूने, चने, तेल और असीर के दानों से दूध बनाना सीखा और वही ..."

मंत्री की चीख निकल गई, "असीर के बीज, चूना, तेल? अबे यह क्या कर रहा है, कोई मर गया तो?"

मंत्री दूधवाले को वही रोता छोड़ कर भागा-भागा राजाजी के द्वारे पहुंचा. बोला, "महाराज, मुझे पता चला है, दरोगा और क्या कहूँ मेरा बिगड़ा हुआ भतीजा भी, सब दूधवाले से मिल गए हैं. आप उनको निकल बाहर कीजिये.

राजा बोला, "मुझे भी शक था. अगर तुम्हारी पैनी निगाह ना होती तो वह मुझे यूं ही चूना लगाते रहते."

चूने की बात सुन कर मंत्री थोड़ा घबराया, फिर तुरंत अपने आप को सयंत करता हुआ बोला, "सत्य वचन, महाराज!"

राजा ने दरोगा और गुप्तचर दोनों को निकाल दिया. मंत्रीजी की बात सच हुई. अगले दिन से ही दूध एकदम से ठीक हो गया. मज़े की बात यह थी कि अब रानी और मत्रानी दोनों प्रसन्न थीं. दूधवाला भी और राजा भी. मंत्री की तो ख़ैर पांचों अगुलियां घी मैं और सिर कढ़ाई में था ही. उसके नाकारा भतीजे को भी दूधवाले की गुप्तचरी के अनुभव कि वजह से पड़ोस के राजा के यहाँ औडिटर कि नौकरी मिल गई.

ऐसा था स्वर्ण-काल का अंत और लाठी काल का प्रारंभिक समय!

Friday, March 25, 2011

Snowy and the Humming Bird [The story was first published in 2004, Sorry, if you have to read this again.]

Sanjay Mathur

It takes some time before one settles in a new house and starts calling it their home. When we bought our first home in California, initially it did not feel like home. The walls were empty. The furniture looked odd, and above all, the backyard looked empty. It was evident, the previous owner ignored the backyard altogether. All it had was a neglected violet-flower shrub and some weeds.

The move to our new home also affected our cat, Snowy. He got confused and angry leaving his earlier abode, where he was very much at-home. There were tears in his eyes when he first sniffed the backyard. The expression of his face clearly said, “You call this empty space a backyard? What right do you have to uproot me from my lively home and put me in this junkyard?” I couldn’t have impressed upon him the importance of owning something in a nice neighborhood as compared to renting a decent place. This little tip from the real-estate world was incomprehensive to him.

I cannot blame him- the poor soul! He was trying his level best to adjust, though it was hard for him. I cannot forget the scene when he dug the soil of the new backyard for the first time. Either the soil was different, or he smelled some other pat’s remainders. All of a sudden, he jumped few feet backward, bent his back in the smallest possible arch, with his tail swelling twice every two seconds. Soon, he ran inside the house, and disappeared somewhere upstairs for a long time.

In a nutshell, the situation was sad. While we were under pressure with our new mortgage payments, moving and other expenses, our cat had lost all confidence in our ability to select the right backyard. On top of it, my backyard was barren. There was only one saving grace. Our kitchen had a very beautiful window with a view extender. You know the type of window that projects outside and provides perfect visibility to all sides. We could view most of our backyard from the kitchen window.

We were unpacking in the kitchen, when my wife looked out of the window and sighed, “Snowy does not seem to be happy here. He is running up and down the stairs as if he has seen a ghost!” I looked out, and I started visualizing how our backyard might look like in the future. I told my wife in a wishful thinking manner, “Dear! One day, this yard is going to be so pretty that not only us but even Snowy would be proud of it. We will plant a Lemon Tree in that corner, a shrub of red flowers there, and vegetables on the other side etc. etc.” She smiled and her eyes became dreamy. Both of us were looking out of the windows as if watching our new backyard. She said, “Yes! One day our backyard will be so pretty that your favorite humming bird will visit us.”

Here, I should tell you about the humming-bird story. In my country of origin, we do not have humming bird as a common bird. I saw it for the first time when we visited Singapore and went to Jurong Bird Park. This remarkable bird instantly and its ability to flip wings so fast, almost like a large insect impressed me quite a bit. We were newly married and had a lot of dreams. Almost hypnotized, we sat down on a stone and watched the bird flying and humming for a long time.

Eventually, the reality of life took priority over dreaming. Days became months and months turned in to years. We lived in different parts of Asia, in the outback and a busy suburb of Australia, and finally migrated to California.

You guessed it right! We met our good old humming-bird once again in California. This time, we found it in its own natural habitat. Both my wife and I were fascinated by the presence of this small bird in our very own neighborhood. It reminded us our good time in Singapore. Somehow, we had a deep association of the tranquility and peace with this little bird.

So, it was a very appropriate that my wife reminded me of the possibility of my humming bird visiting our backyard one day. I was sub-consciously looking for a reward for doing all the potential hard-work in my backyard.

Well, as the days passed, we started working on the backyard painstakingly. Between the work, children and cat, neither my wife nor I had very-much time. Yet, whatever time we could devote made a slow but consistent improvement in the backyard. We planted the lemon tree as planned. After a while, it started growing bigger and wider. We were eventually successful in preparing flowerbeds and a patch for a few perennial plants.

When Snowy started feeling at-home, he stopped digging the fresh plantation. Things started falling in to the right places. The daisies, sunflowers and marigold bloomed and so did the vegetables. Our backyard took some shape and a character.

It was a perfect Sunday after-noon. We were relaxed and resting at-home. I was looking through the kitchen window. Snowy was resting under the violet-shrub peacefully. The garden was looking good. I remembered the humming bird. My wife read my mind. While preparing my favorite English tea, she asked me, “Looking for your humming bird?”


“Do not worry dear, we will buy a bird-feeder and attract the humming bird.”

“No”, I said, “Don’t buy the bird-feeder. Let it come to our backyard all by itself. We’ll wait.” She smiled and said nothing.

Few days later, it happened. I was getting my cereal from the kitchen-shelf, when I first noticed it. Indeed, there was a beautiful humming-bird hovering over my fence. The morning dew was shining on the wings of the cute little humming bird. I stood there motionless for a few seconds looking through the window, watching at the hovering beauty. It was a moment of fulfillment for me. I was thanking God for recognizing and blessing our hard work. Just then, I realized my wife had joined me in admiring the new phenomenon in our backyard. Neither one of us spoke and just kept looking outside, admiring the little bird in silence. Our treat did not last for a long time, as the bird decided to hover off our property and go elsewhere. Its short stay was good enough to cheer us up for a long time to come.

As the days passed, Humming Bird’s visit became a regular affair. We started waiting for the humming bird’s visit at the breakfast time. Most of the days, it obliged us by appearing out of the blue, hovering over the flowers, sampling the nectar, and generally blessing our garden. While this was happening, another phenomenon was taking place. Following our line of vision and his animal instincts, it slowly dawned on Snowy that we are not paying him the same attention as before. My wife also confirmed my doubts by saying, “Snowy is not eating well.” I tried to talk Snowy in to eating his favorite food, but he ignored me and sat under his favorite violet-flower shrub.

I was reading my morning newspaper, when outside of the window; from the corner of eye, I saw something moving swiftly in the air. Following that I saw Snowy landing on the patio with a thud! I came out and saw the inevitable. The humming bird was lying in front of Snowy and Snowy was sniffing it. I was motionless for an instance then I leapt towards the bird. Snowy saw me coming towards him. In a quick reflex-action, he picked up the bird in his mouth and jumped behind the shrub. This happened in a very short time. I do not remember clearly what happened next. I must have been shouting and cursing Snowy at the top of my voice, when my wife must have came rushing towards me in the backyard.

“What happened, dear?” My wife asked me. I was still shouting with a horse voice, “Snowy, come back here at-once.” She realized what might have happened. She held my hand and dragged me inside the house. My face turned red and I was panting heavily, trying to get to Snowy. I shouted, “Snowy is killing the humming bird!” … “What should we do?”

“Nothing”, she said.

“Nothing…what do you mean?” I snapped her in with a quivering voice.

“Yes! Do nothing. I know how you love the Humming Bird. You love Snowy, too, right? Snowy is a hunter by nature. He hunts birds. All of us have our own nature. We are a part of Mother Nature. This is the way Mother Nature has worked for Millions of years. She said in soft yet determined voice, “It is OK! The bird is gone. We cannot bring it back. Let us go inside.”

I came in and sat down on my sofa with a heavy heart. I realized my wife was probably right. But, how can Mother Nature be so cruel? My dream was shattered by my very own pet. Slowly, my anger turned in to remorse. I covered my face with my hands and pressed hard.

While I was going through the changing emotions, with a confident gait, Snowy came inside the house. He jumped on the sofa, and came to me purring, hoping I’ll pat him, and reward him for his bravery. I took my hands off my face and looked at him. He looked so cute, happy and satisfied. My wife nudged me softly towards him. I sighed and leaned towards Snowy and picked him in my lap. Looking at him, I asked him helplessly, “Do you know what you have done?” Without understanding a single word of what I said, Snowy purred heavily, and closed his eyes. My wife wiped the corner of her eye and said, “Whatever cannot be cured, must be endured.” She joined me in patting Snowy. We sat there for a long time without saying a word. Snowy slept in my lap happily.

Well, Mother Nature won again!

Saturday, March 12, 2011

जो लोग उस पार रहते हैं, पानी पे चलते हैं क्या
उनको भी तो किसी नांव की दरकार होती होगी
पतवार तो वह भी लेते होंगे हाथों में भी क़िबला
एक नाखुदा की ज़रूरत तो उनको भी होती होगी
जब घिर के आते होंगे तूफां दरिया पे काले से
उनकी माँ भी तो डर-डर के दुआगो होती होंगी
जब हल छोड़ के पकड़ते होंगे लड़के बंदूके उधर
गोलियों से खेती-बाड़ी तो वहाँ भी न होती होगी
जब किसी को लग जाएँ एक आध आवारा गोली
उनकी भी हमारी तरह आँखे नम तो होती होंगी
इस तरफ का घाट तो तिल-तिल करके टूट रहा
“संजय” न जाने उधर के कछार की गत क्या होगी

Thursday, March 10, 2011

व्याकरण का चलना
[Grammar Lessons]

"जानवर चार पैर से चलते हैं
उन्हें चौपाया कहते हैं
हम लोग दो पैर से चलते हैं
उसे पैदल चलना कहते हैं
हम लोग पैदल चलते आये हैं
हम लोगों को पैदल चलना चहिए
आज हम लोग पैदल चलेंगे...
पर पापा, लोग पैदल क्यों नहीं चलते?"

"मुन्ना ये सब छोडो!
व्याकरण का पाठ पढ़ो
जानवर चार पैर से चलते हैं
हम लोग दो पैर से चलते हैं..."